हमारा भारत देश आज आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है।। इस पावन अवसर पर हमारे सीए सदस्यों ने भारत देश और उसकी आजादी के विविध पहलू पर अपने विचार कविता के माध्यम से प्रकट कि ए है।। हर काव्य से पहले एक कयूआर कोड (QR Code) दि या गया है, जि से स्के न करके आप इन काव्यो को रचयि ता के स्वर में सुन भी सकते है।।
आज़ाद परिंदे

आज़ाद उस परिंदे को क्या पता है
क़ै द में रहना क्या होता है
घुटते रहना, सहमे रहना
सिसक्ते रहना क्या होता है
कुछ ऐसे ही, हालात हैं अपने
बेख़ुदी में जी रहें हम सब
खुद की मनमानी करते
अपने दिल की हाँक रहे हम सब
अंग्रेजों से लेकर आज़ादी
अपनों से ही लड़ रहें हैं
ख़या लों में दरारें बनाकर
नफ़रत के बीज बो रहें हैं
नौजवानों को लल्कारे मि ट्टी
ए गरम ख़ून! क्या सोच रहा है
१९४७ की थी आज़ादी
अब तुझे बहुत कुछ करना है
इस बार , लक्ष्य तेरा
बर्क़ त और शोहरत पाना होगा
अमन और ख़ुशहाली की फ़सल उगाकर
सरज़ मीं सोना करना होगा
ख़ुदकी क़ाबिलिय त पहचान तू
तरक़्क़ी को बना अपना ईमान तू
ऊँचाइयों को हासिल करने
लगा दांव पे अपनी जान तू
अमृत महोत्सव के सुनहरे अवसर पर
तिलक लगा, सेहरा बांध तू
पुश्तै नी रगोमें खून तेरा
उसका क़र्ज़ अब दे उतार तू
सारे जहान से जो अच्छा है
उसपे न आँच आने पाए
हौंसला बुलंद कर ले अपना
दिल में समेटे इक तूफान तू।
– सीए प्रीती चेरियन
आज़ादी के शहीदों को काव्यांजली

आज़ादी का यह अमृत पर्व मि लेंगे और मनाएंगे
एक जुट हो सभी मि लकर गीत बलि दान गाएंगे
इसी आज़ादी हेतु ही, कई बलि दान हुए जीवन
खुले में साँस ले पायें, तुम्हारी पीर को वंदन
सुनी टोपे और मंगल की, सुनी मंगल कहानी है
देश हि त में हुई हैं होम कितनी ही जवानी है
रा नी लक्ष्मी पड़ी थी फ़ौ ज शत्रु पर बड़ी भारी
अकेले दम पर ही बेदम अरि सेना करी सारी
देश बलि दानियों ने था सहा अपमान अपार था
सजाये काले पानी का ही शाय द वह खुमार था
जेल भी रोक ना पायी हमारे सिहं शावक को
न कोल्हू भी झुका पाया वीर सावर विनायक को
देखा हमने शि शु बसु, खुदी रा म और चाकी को
बिनय बादल दिनेश सी प्रलय की वीर झांकी वो
देख कर सिहं ऊधम को, डरा डायर था भर्राया
बदला लेकर जलियाँ का जो लंदन भी था थर्राया
चंद्रशेखर आज़ाद का, कहीं कोई नहीं सानी
रक्त है खौल जाता है भरें आँखों में है पानी
चली हुई रेल से धन धान्य जब गोरों का था लूटा
गोरे शासन अत्याचार पर ग़ुस्सा था वह फूटा
रा म बिस्मि ल भगत सिहं और सुख देव थे राज गुरु
भरी दीवानों की गाथा, कहाँ से मैं करूँ शुरू
हँसते हँसते पहने थे वे फाँसी के फंदों को
हुए आज़ाद खुद भी और किया आज़ाद परिंदों को
नहीं पैदा है इस जग में बोस सा कोई और जना
फोड़ जो भा ड़ को पायें अकेला ऐसा वह चना
पड़ी जो राय के तन पर चोट हर एक लाठी की
हुई साबित वही अंग्रेज शासन की कफ़न काठी
बाल और पाल के सपनों का अपना देश बनाना है
बहादुर लाल भा ई वल्लभ बापू परिवेश सजाना है
शहीदी रज से मस्तक पर तिलक छापा लगाते हैं
आज़ादी का यह अमृत पर्व हम मि लजुल मनाते हैं
– डो. सीए राकेश गुप्
नये भारत की नई तस्वीर

हि मालय की चोटिय से,
देश मेरा बोल रहा
आत्मनिर्भर पथ पर,
यह गर्व से है डोल रहा
रा केट, उपग्रह छोड़ रहा,
चांद-मंगल नाप रहा
हर रहस्य अंतरिक्ष का,
देश मेरा खोल रहा
महामार ी में जब,
मौत का साया था मंडरा रहा
टीका मेरे देश का,
सकल विश्व में अमोल रहा
विकास मे अव्वल है,
खेलकूद में है खिल रहा
हर मोर्चे पर देश मेरा,
अतुल्य अनमोल रहा
बिजली, पानी, सड़क से,
हर गांव संवर हो रहा
फसल का पूरा दाम देख,
किसान मगन डोल रहा
एक देश, एक कानून,
एक हमार ी पहचान हो
झंडा ऊंचा रहे हमारा ,
बच्चा -बच्चा बोल रहा
अमर जवानो का बलि दान,
देश या द कर रहा
योगदान आजादी में,
जिनका अनमोल रहा
यह अखंड है,
अजेय है,
देश मेरा बेजोड़ है ।।
आजादी अमृत महोत्सव पर,
‘पथिक’ गर्व से बोल रहा
– डो. सीए मयूर भानूकुमार नायक
‘पथिक’